मणिपुर में गहराता संकट: बंद बाजार और आसमान छूती महंगाई
मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में कुकी और नगा समुदायों के बीच जारी तीव्र तनाव ने जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। पिछले सात दिनों से कई क्षेत्रों में स्कूल और बाजार पूरी तरह बंद हैं, जिससे आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सात प्रमुख पहाड़ी जिलों में सड़कों और हाईवे पर नाकेबंदी के कारण आवाजाही ठप है, जिससे आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई चेन पूरी तरह टूट चुकी है। स्थिति इतनी विकट है कि कांगपोकपी जैसे इलाकों में चीनी की कीमतें ₹400 से ₹450 प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि डर के साये में रहने के कारण लोग न तो खेतों में जा पा रहे हैं और न ही सामान्य कामकाज कर पा रहे हैं।
खून-खराबा और सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी चुनौती
हिंसा की इस भयावह लहर में पिछले चार दिनों के भीतर 4 महिलाओं सहित कुल 6 कुकी लोगों की हत्या कर दी गई है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश और तनाव चरम पर है। कुकी संगठनों ने इन हत्याओं के लिए नगा समुदाय को जिम्मेदार ठहराया है। हाल ही में चावांगकिनिंग लियांगमाई गांव में उग्रवादियों ने हमला कर कई घरों को आग के हवाले कर दिया और अंधाधुंध फायरिंग की। इस हमले के दौरान CRPF के जवानों ने मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की, जिससे लगभग 6 घंटे तक गोलीबारी चलती रही। इसके अलावा, तामेंगलोंग जिले के लीसांगफाई गांव में दो कुकी महिलाओं की गोली मारकर हत्या करने की घटना ने स्थिति को और भी संवेदनशील बना दिया है।
“मेडिकल इमरजेंसी या एयरपोर्ट जाने के लिए भी अब प्रशासन से विशेष अनुमति लेनी पड़ रही है। लोग डर के मारे घरों से बाहर निकलने में भी संकोच कर रहे हैं।” – स्थानीय निवासी
स्थानीय निवासियों के अनुसार, सुरक्षा के बिना निजी वाहनों का चलना लगभग असंभव हो गया है। उखरुल, सेनापति और तामेंगलोंग जैसे नगा बहुल जिले और चूराचांदपुर व कांगपोकपी जैसे कुकी बहुल जिलों के बीच की भौगोलिक स्थिति ने संघर्ष को और जटिल बना दिया है।
हिंसा की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण
मणिपुर में यह अस्थिरता कोई नई घटना नहीं है; इसकी जड़ें मई 2023 में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच शुरू हुई हिंसा में छिपी हैं। हालांकि, इस साल फरवरी में उखरुल के लिटन गांव से शुरू हुए नए संघर्ष ने पहाड़ी इलाकों में हिंसा की आग को फिर से भड़का दिया है। स्थानीय संगठनों के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल फरवरी से अब तक इस संघर्ष में लगभग 40 लोगों की जान जा चुकी है। वर्तमान में, सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद, समुदायों के बीच बढ़ता अविश्वास और सड़कों पर जारी नाकेबंदी भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।

