उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में अपने क्षेत्रों की समस्याओं और बुनियादी मुद्दों को लेकर सबसे ज्यादा सवाल भाजपा के ही विधायक उठा रहे हैं। सत्र के पहले तीन दिनों की कार्यसूची में दर्ज प्रश्नों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि सरकार को अपने ही विधायकों के सवालों का सबसे अधिक सामना करना पड़ रहा है।

अब तक सदन में कुल 255 सवाल दर्ज हुए हैं, जिनमें से 155 प्रश्न भाजपा विधायकों के हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के विधायकों की ओर से 67 सवाल पूछे गए हैं। इस हिसाब से करीब 60 प्रतिशत सवालों के जवाब सरकार को अपने ही दल के विधायकों को देने पड़ रहे हैं, जबकि कांग्रेस के सवालों की हिस्सेदारी लगभग 26.27 प्रतिशत है।

गुरुवार को ‘हिन्दुस्तान’ द्वारा प्रश्नकाल की समीक्षा में यह स्थिति सामने आई। यदि विधायकों की संख्या के औसत के आधार पर देखा जाए तो निर्दलीय विधायक इस मामले में भाजपा और कांग्रेस दोनों से आगे नजर आ रहे हैं। दो निर्दलीय विधायकों ने अब तक प्रश्नकाल के लिए 33 सवाल दर्ज कराए हैं।

व्यक्तिगत स्तर पर सवाल पूछने के मामले में भाजपा विधायक महेश जीना सबसे आगे हैं। उन्होंने अब तक 44 सवाल पूछे हैं। दूसरे स्थान पर निर्दलीय विधायक संजय डोभाल हैं, जिनके 28 सवाल दर्ज हैं। तीसरे स्थान पर भाजपा के प्रीतम सिंह पंवार, राम सिंह कैड़ा और कांग्रेस के सुमित हृदयेश हैं, जिनके 19-19 सवाल कार्यसूची में शामिल हैं।

विधानसभा के पूर्व सचिव और संवैधानिक मामलों के जानकार जगदीश चंद्र का कहना है कि प्रश्नकाल विधानसभा की कार्यवाही का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसके माध्यम से सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही तय होती है। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे अपने क्षेत्र की समस्याओं, विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों को प्रश्नकाल में उठाएं।

उन्होंने बताया कि प्रश्न अल्पसूचित, तारांकित और अतारांकित श्रेणियों में पूछे जाते हैं। चाहे विधायक सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, प्रश्नकाल के जरिए सरकार का ध्यान जनता से जुड़े मुद्दों की ओर आकर्षित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि विधायकों को प्रश्न पूछने के अपने अधिकार का अधिकतम उपयोग करना चाहिए और सरकार को भी इन सवालों के जवाब समय पर उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि जनसमस्याओं का प्रभावी समाधान हो सके।

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