दिव्यांग सैनिकों के हक में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग सैनिकों के पेंशन और अन्य कल्याणकारी लाभों को लेकर केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय के रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार इन सैनिकों के खिलाफ ट्रिब्यूनल से लेकर हाई कोर्ट और स्वयं उच्चतम न्यायालय तक कानूनी लड़ाई लड़ रही है, जो कि पूरी तरह से अनुचित है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि सरकार द्वारा दायर की जा रही अधिकांश अपीलों में अत्यधिक देरी की गई है, जिससे न्याय मिलने की प्रक्रिया बाधित हो रही है।
रक्षा मंत्रालय की सिफारिशों की अनदेखी और चौंकाने वाले आंकड़े
मामले की गंभीरता को उजागर करते हुए बेंच ने बताया कि रक्षा मंत्री की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से सिफारिश की गई थी कि विकलांगता और पेंशन लाभ से जुड़े लंबित मामलों में अपीलों को तुरंत वापस ले लिया जाना चाहिए। इसके बावजूद, रक्षा मंत्रालय ने इस महत्वपूर्ण सुझाव को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि 270 से अधिक ऐसी अपीलों को दायर किया गया, जबकि उन्हें वापस लेने की सिफारिश पहले ही की जा चुकी थी।
न्यायालय ने RTI के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। आंकड़ों के अनुसार, पहली अपीलीय अथॉरिटी के समक्ष आई 2,997 अपीलों में से 2,855 को खारिज कर दिया गया, जबकि केवल 142 अपीलों को ही स्वीकार किया गया। इसी तरह, दूसरी अपीलीय अथॉरिटी के सामने 456 मामले आए, जिनमें से 439 खारिज कर दिए गए और महज 17 को स्वीकार किया गया। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कई अपीलें तो केवल समय-सीमा (limitation) बीत जाने के कारण खारिज होने की कगार पर हैं, जो प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाता है।
नियमों की व्याख्या और भविष्य का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने ‘एंटाइटेलमेंट रूल्स 2008’ के मौजूदा ढांचे को बरकरार रखते हुए नए नियमों को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सैनिक की विकलांगता के मामले में यह साबित करने की जिम्मेदारी नियोक्ता (सरकार) की है कि वह विकलांगता सैन्य सेवा के दौरान नहीं हुई है। कोर्ट ने उस धारणा को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यदि कोई सदस्य स्वस्थ हालत में सेवा में शामिल होता है और विकलांगता के साथ सेवा छोड़ता है, तो उसे सेवा-संबंधी विकलांगता नहीं माना जाना चाहिए। इस फैसले के माध्यम से न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार को अपने सैनिकों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए और अनावश्यक मुकदमेबाजी के बजाय उनके अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

