उत्तराखंड की सियासत में बुधवार को बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। श्रीनगर नगर निगम की निर्दलीय मेयर आरती भंडारी समेत 10 पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की खबर से प्रदेश की सियासत गरमा गई है। इस घटनाक्रम को खासतौर पर कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े आधिकारिक बयान और शामिल होने वाले सभी पार्षदों के नामों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।
श्रीनगर नगर निगम की राजनीति शुरू से ही प्रदेश के अन्य नगर निगमों से अलग रही है। वर्ष 2025 में हुए पहले नगर निगम चुनाव में भाजपा ने प्रदेश के 11 नगर निगमों में से 10 में मेयर पद पर जीत दर्ज की थी, जबकि श्रीनगर में निर्दलीय प्रत्याशी आरती भंडारी ने जीत हासिल कर इतिहास रचा था। आरती भंडारी श्रीनगर नगर निगम की पहली मेयर बनी थीं। उन्होंने भाजपा की आशा उपाध्याय को 1,639 मतों के अंतर से हराया था।
चुनाव में निर्दलीयों का रहा था दबदबा
2025 के निकाय चुनाव में श्रीनगर नगर निगम के 40 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा देखने को मिला था। चुनाव परिणाम के अनुसार 18 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए थे, जबकि भाजपा के 16 और कांग्रेस के 6 पार्षद चुनाव जीतकर नगर निगम पहुंचे थे।
मेयर पद पर आरती भंडारी की जीत भी इसलिए महत्वपूर्ण रही थी क्योंकि उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के प्रत्याशियों को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की थी। आरती भंडारी को 7,959 वोट मिले थे, जबकि भाजपा प्रत्याशी आशा उपाध्याय को 6,320 वोट प्राप्त हुए थे।
भाजपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है घटनाक्रम?
यदि आरती भंडारी और 10 पार्षदों का भाजपा में शामिल होना आधिकारिक रूप से पुष्ट होता है, तो श्रीनगर नगर निगम की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आ सकता है। भाजपा के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि 2025 के चुनाव में पार्टी ने मेयर पद गंवाने के बावजूद 16 पार्षदों के साथ निगम में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी।
दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम संगठनात्मक स्तर पर झटका माना जा सकता है। हालांकि श्रीनगर नगर निगम के चुनाव परिणामों में कांग्रेस के खाते में केवल 6 पार्षद आए थे, लेकिन निर्दलीय पार्षदों की बड़ी संख्या के कारण निगम की राजनीति में समीकरण शुरू से ही काफी महत्वपूर्ण रहे हैं।
आरती भंडारी की राजनीतिक पृष्ठभूमि
आरती भंडारी ने 2025 के निकाय चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को चुनौती दी थी। चुनाव से पहले उनके पति लखपत भंडारी भाजपा से जुड़े रहे थे और आरती के निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। आरती भंडारी इससे पहले क्षेत्र पंचायत प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य के रूप में भी काम कर चुकी हैं।
मेयर बनने के बाद उन्होंने श्रीनगर को स्वच्छ और ग्रीन सिटी बनाने, सफाई व्यवस्था सुधारने तथा महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया था।
अब क्या बदलेगा?
आरती भंडारी और पार्षदों के भाजपा में जाने की पुष्टि होने के बाद सबसे बड़ा सवाल नगर निगम के अंदर राजनीतिक समीकरण और बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर होगा। अगर 10 पार्षदों के साथ मेयर भी भाजपा में शामिल होती हैं, तो भाजपा की निगम के भीतर राजनीतिक ताकत काफी बढ़ सकती है।
हालांकि, केवल पार्टी में शामिल होने से नगर निगम की सभी संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं अपने आप नहीं बदलतीं। वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि शामिल होने वाले पार्षद किस राजनीतिक समूह के रूप में काम करते हैं और निगम के महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका क्या रहती है।
प्रदेश की राजनीति में भी संदेश
श्रीनगर गढ़वाल को उत्तराखंड की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में नगर निगम की राजनीति में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव स्थानीय स्तर से आगे जाकर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है।
2025 के निकाय चुनाव में भाजपा ने 11 नगर निगमों में से 10 मेयर पदों पर जीत दर्ज की थी और श्रीनगर ही एकमात्र नगर निगम था जहां भाजपा को मेयर पद पर हार मिली थी। ऐसे में अगर निर्दलीय मेयर और उनके साथ पार्षद भाजपा में शामिल होते हैं, तो इसे भाजपा के लिए श्रीनगर में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।


