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    Home»उत्तराखंड»भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली का विस्तार, 500 नए सेंसर लगाने की योजना
    उत्तराखंड

    भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली का विस्तार, 500 नए सेंसर लगाने की योजना

    adminBy adminMay 4, 2026No Comments4 Mins Read
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    भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली का विस्तार, 500 नए सेंसर लगाने की योजना
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    आपदा से निपटने के लिए तकनीकी संस्थाओं और प्रशासन के बीच समन्वय बढ़ाने के निर्देश

    देहरादून। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सोमवार को सचिवालय में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली, राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम तथा भूस्खलन न्यूनीकरण के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। उन्होंने सभी परियोजनाओं पर कार्यों की प्रगति का जायजा लेते हुए संबंधित विभागों तथा संस्थानों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

    बैठक में ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण के अंतर्गत उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा वर्तमान प्रगति एवं भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि वाडिया संस्थान द्वारा वसुंधरा झील को एक पायलट साइट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम एवं मॉनिटरिंग मैकेनिज्म स्थापित किए जाएंगे। इस मॉडल को भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर भी लागू करने की योजना है, जिससे राज्य में ग्लेशियर झीलों से जोखिम प्रबंधन को वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से सुदृढ़ किया जा सके।

    मुख्य सचिव ने निर्देशित किया कि वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी वर्ष 2026-27 एवं 2027-28 के लिए प्रस्तावित गतिविधियों का विस्तृत टाइमलाइन प्रस्तुत करे, जिसमें स्पष्ट हो कि कब कौन से कार्य किया जाना है। इसके अतिरिक्त संस्थान को निर्देश दिए गए कि न्यूनीकरण उपायों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाए, जिसमें अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने, रियल-टाइम मॉनिटरिंग एवं डिसीजन सपोर्ट सिस्टम तथा स्ट्रक्चरल उपाय जैसे पानी का नियंत्रित निकास और झील का स्तर कम करने के उपाय शामिल हों।

    वहीं दूसरी बैठक में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली की समीक्षा की गई। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि अवगत कराया गया कि वर्तमान में 169 सेंसर एवं 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं। आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर लगातार अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में 26 फरवरी, 2026 को आईआईटी रुड़की के साथ एक महत्वपूर्ण एमओयू हस्ताक्षरित किया गया है, जिसके अंतर्गत 01 जनवरी, 2026 से 31 दिसंबर, 2026 तक ईईडब्ल्यूएस प्रणाली के अलर्ट प्रसारण, संचालन एवं अनुरक्षण का कार्य किया जा रहा है। राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत राज्य में भूकम्पीय संवेदनशील क्षेत्रों में 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर की तैनाती की जा रही है, जिससे मौजूदा चेतावनी प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाया जा सके। इसके अतिरिक्त चेतावनी प्रसार को प्रभावी बनाने के लिए 526 सेंसर (500 स्वदेशी ईईडब्ल्यूएस सायरन एवं 26 मल्टी-हैजार्ड अर्ली वार्निंग सायरन) की स्थापना भी प्रस्तावित है।

    सचिव सुमन ने बताया कि राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केंद्र के अंतर्गत देशभर में कुल 167 सिस्मोलॉजिकल वेधशालाएं संचालित हैं, जिनमें से 8 उत्तराखण्ड में स्थापित हैं। राज्य में भूकम्पीय निगरानी को और सुदृढ़ करने के लिए रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ एवं चकराता में नई स्थायी वेधशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव है। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली को और अधिक प्रभावी, सटीक एवं त्वरित बनाया जाए तथा आमजन तक चेतावनी संदेशों का समयबद्ध एवं व्यापक प्रसार सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने सेंसर एवं सायरन नेटवर्क के विस्तार तथा उनके नियमित अनुरक्षण पर विशेष ध्यान देने को कहा।

    वहीं तीसरी बैठक में डिब्रिस फ्लो (मलबा बहाव) से संबंधित जोखिम आकलन पर किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी गई। बताया गया कि चमोली, उत्तरकाशी एवं पिथौरागढ़ जनपदों में कुल 48 संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है। ये सभी स्थान मुख्यतः जल निकासी मार्गों (ड्रेनेज चैनल) के आसपास स्थित हैं, जिन्हें जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम एवं निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, ताकि प्राथमिकता के अनुसार कार्य किया जा सके।

    इस कार्य के लिए विभिन्न संस्थानों को शामिल करते हुए एक संयुक्त समिति का गठन किया गया है, जिसमें उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान तथा उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र शामिल हैं। मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चिन्हित संवेदनशील स्थलों पर प्राथमिकता के आधार पर सर्वेक्षण, निगरानी एवं आवश्यक निवारक कार्य किए जाएं। उन्होंने जिला प्रशासन एवं तकनीकी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

    बैठक में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. वी.के. गहलोत, डॉ. के. लुइरेई, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. मनीष मेहता, यूसैक की वैज्ञानिक डॉ. आशा थपलियाल, यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. कानूनगो, जेसीईओ मो0 ओबैदुल्लाह अंसारी उपस्थित रहे। आईआईटी रुड़की के प्रो0 कमल, जीएसआई के निदेशक रवि नेगी तथा डाॅ. अजय चैरसिया ने ऑनलाइन बैठक में प्रतिभाग किया।

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