Dainik UjalaDainik Ujala
    What's Hot

    ऋषिकेश बाईपास फोरलेन को मिली 1105 करोड़ की मंजूरी, केंद्र ने दी हरी झंडी

    April 1, 2026

    देहरादून: मसूरी रोड पर गैंगवार की गोलीबारी में रिटायर्ड ब्रिगेडियर की दर्दनाक मौत

    March 31, 2026

    रुद्रप्रयाग की होनहार खिलाड़ी का राज्य टीम में चयन, ग्रामीणों ने किया भव्य सम्मान

    March 30, 2026
    Facebook Twitter Instagram
    Wednesday, April 1
    Facebook Twitter Instagram
    Dainik Ujala Dainik Ujala
    • अंतर्राष्ट्रीय
    • राष्ट्रीय
    • उत्तराखंड
      • अल्मोड़ा
      • बागेश्वर
      • चमोली
      • चम्पावत
      • देहरादून
      • हरिद्वार
      • नैनीताल
      • रुद्रप्रयाग
      • पौड़ी गढ़वाल
      • पिथौरागढ़
      • टिहरी गढ़वाल
      • उधम सिंह नगर
      • उत्तरकाशी
    • मनोरंजन
    • खेल
    • अन्य खबरें
    • संपर्क करें
    Dainik UjalaDainik Ujala
    Home»उत्तराखंड»उत्तराखंड की पारंपरिक निर्माण शैली: आपदाओं में भी अडिग मंदिर और भवन
    उत्तराखंड

    उत्तराखंड की पारंपरिक निर्माण शैली: आपदाओं में भी अडिग मंदिर और भवन

    Amit ThapliyalBy Amit ThapliyalSeptember 26, 2025No Comments2 Mins Read
    Facebook Twitter Pinterest WhatsApp LinkedIn Tumblr Email Telegram
    उत्तराखंड की पारंपरिक निर्माण शैली: आपदाओं में भी अडिग मंदिर और भवन
    Share
    Facebook WhatsApp Twitter Email LinkedIn Pinterest

    देहरादून। इस साल डके मानसून ने उत्तराखंड में भूस्खलन, बाढ़ और भूधंसाव से भारी तबाही मचाई। कई सड़कें, पुल और आधुनिक इमारतें ढह गईं, लेकिन सदियों पुराने मंदिर और पारंपरिक भवनों को कोई खास नुकसान नहीं हुआ।

    क्यों मजबूत हैं प्राचीन निर्माण?

    भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक भवन स्थानीय भूगोल और जलवायु के अनुसार बनाए जाते थे। इनमें पत्थर, लकड़ी और मिट्टी का संतुलित उपयोग होता था। भार इस तरह बांटा जाता था कि आपदा के समय संरचना टिकाऊ बनी रहे। 2013 की केदारनाथ आपदा इसका बड़ा उदाहरण है, जब मंदिर सुरक्षित रहा लेकिन आसपास की नई इमारतें बह गईं।

    कोटी बनाल शैली का कमाल

    यमुनाघाटी के कोटी गांव में 1000 साल पुराने बहुमंजिला मकान आज भी मजबूती से खड़े हैं। कोटी बनाल शैली में दीवारों में लकड़ी और पत्थर का संयोजन किया जाता था, जिससे घर भूकंप और आपदाओं में लचीले बने रहते थे।

    जमीन का बारीकी से निरीक्षण

    इतिहासकार डॉ. अजय रावत के अनुसार, प्राचीन काल में निर्माण से पहले जगह का सालों तक परीक्षण किया जाता था। कठोर चट्टानों और सुरक्षित स्थानों पर ही इमारतें बनाई जाती थीं। इसके विपरीत, आज नदी-नालों और कमजोर मिट्टी पर अंधाधुंध निर्माण हो रहा है, जिससे पहाड़ियां दरक रही हैं।

    बढ़ता निर्माण और खतरा

    भूवैज्ञानिक त्रिभुवन सिंह पांगती का कहना है कि नैनीताल और जोशीमठ जैसे इलाके पहले ही अपनी क्षमता से ज्यादा आबादी और निर्माण झेल रहे हैं। लगातार हो रहे निर्माण से आपदाओं का खतरा और बढ़ रहा है। वहीं टपकेश्वर, मसूरी, देवप्रयाग, बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे क्षेत्र कठोर चट्टानों पर बसे होने के कारण अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।

    Share. Facebook WhatsApp Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email Telegram
    Avatar photo
    Amit Thapliyal

    Related Posts

    ऋषिकेश बाईपास फोरलेन को मिली 1105 करोड़ की मंजूरी, केंद्र ने दी हरी झंडी

    April 1, 2026

    देहरादून: मसूरी रोड पर गैंगवार की गोलीबारी में रिटायर्ड ब्रिगेडियर की दर्दनाक मौत

    March 31, 2026

    रुद्रप्रयाग की होनहार खिलाड़ी का राज्य टीम में चयन, ग्रामीणों ने किया भव्य सम्मान

    March 30, 2026

    देहरादून एयरपोर्ट पर समर शेड्यूल लागू, 34 फ्लाइट्स को मंजूरी, 12 शहरों के लिए डायरेक्ट उड़ानें शुरू

    March 29, 2026
    Add A Comment

    Comments are closed.

    © 2026 Dainik Ujala.
    • Home
    • Contact Us

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Go to mobile version