Dainik UjalaDainik Ujala
    What's Hot

    उत्तराखंड में मौसम का कहर: बदरी-केदारनाथ में बर्फबारी, देहरादून में बारिश का अलर्ट

    April 8, 2026

    उत्तराखंड में खनन राजस्व ने बनाया इतिहास, धामी सरकार में 1200 करोड़ से ज्यादा आय

    April 7, 2026

    14 अप्रैल को उत्तराखंड आएंगे पीएम मोदी, करोड़ों की योजनाओं का करेंगे उद्घाटन

    April 6, 2026
    Facebook Twitter Instagram
    Wednesday, April 8
    Facebook Twitter Instagram
    Dainik Ujala Dainik Ujala
    • अंतर्राष्ट्रीय
    • राष्ट्रीय
    • उत्तराखंड
      • अल्मोड़ा
      • बागेश्वर
      • चमोली
      • चम्पावत
      • देहरादून
      • हरिद्वार
      • नैनीताल
      • रुद्रप्रयाग
      • पौड़ी गढ़वाल
      • पिथौरागढ़
      • टिहरी गढ़वाल
      • उधम सिंह नगर
      • उत्तरकाशी
    • मनोरंजन
    • खेल
    • अन्य खबरें
    • संपर्क करें
    Dainik UjalaDainik Ujala
    Home»उत्तराखंड»जागड़ा पर्व: देवभूमि की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर
    उत्तराखंड

    जागड़ा पर्व: देवभूमि की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर

    Amit ThapliyalBy Amit ThapliyalAugust 26, 2025No Comments4 Mins Read
    Facebook Twitter Pinterest WhatsApp LinkedIn Tumblr Email Telegram
    Share
    Facebook WhatsApp Twitter Email LinkedIn Pinterest

    देहरादून: उत्तराखंड की वादियों में जब सावन-भाद्रपद के महीने में भक्ति और उल्लास का संगम होता है, तब उत्तराखंड की वादियों में बसे हनोल में जागड़ा पर्व का आयोजन देव-धर्म और लोकसंस्कृति को जीवंत कर देता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामूहिकता, लोक-नृत्य, लोक-संगीत और सांस्कृतिक धरोहर का भी अद्भुत उत्सव है। आइये जानते है इस पर्व की महत्ता और इससे जुडी कहानिया।

    जागड़ा पर्व क्या है?

    सबसे पहले यह जानना जरूरी है की है क्या। और इसे क्यों मनाया जाता है । बता दें की जागड़ा पर्व जौनसार-भाबर और उत्तरकाशी क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव है। यह भगवान महासू देवता की पूजा-अर्चना और उनके ऐतिहासिक ‘जागर’ अनुष्ठान से जुड़ा हुआ है। “जागर” शब्द का अर्थ है देवताओं का आह्वान करना और इस दौरान लोकगायक ढोल-दमाऊं और रणसिंघे की गूंज के साथ देवी-देवताओं की कथाएं गाते हैं।

    हनोल स्थित महासू देवता का मंदिर इस पर्व का मुख्य केंद्र है। मान्यता है कि देवभूमि के चार भाइयों – महासू देवताओं – में प्रमुख महासू देवता का मंदिर यहीं स्थापित हुआ। जागड़ा पर्व इन्हीं देवताओं की स्मृति और शक्ति के सम्मान में मनाया जाता है।

    महासू देवता की कथा

    महासू देवता की कथा हिमालयी लोकजीवन और आस्था से गहराई से जुड़ी है।लोकमान्यता है कि प्राचीन काल में मलिन नामक राक्षस हनोल क्षेत्र में अत्याचार करता था। लोगों ने देवी-देवताओं से रक्षा की प्रार्थना की। इस पर महादेव की कृपा से महासू देवता का जन्म हुआ। वे चार भाई माने जाते हैं – बासिक, पाबसिक, छल्देव और बुठासू। चारों भाईयों को मिलाकर “महासू” कहा जाता है। कथा के अनुसार महासू देवताओं ने राक्षस मलिन का वध कर जनमानस को आतंक से मुक्त कराया। उसी घटना की स्मृति में हनोल में उनका मंदिर स्थापित किया गया और तभी से यह क्षेत्र उनकी भूमि माना जाता है।

    महासू देवता को न्याय के देवता भी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसकी हर कठिनाई दूर होती है और उसे न्याय मिलता है। आज भी लोग अपनी समस्याएं और विवाद उनके दरबार में रखते हैं।

    जागड़ा पर्व पर हजारों श्रद्धालु हनोल मंदिर पहुंचकर महासू देवता का आशीर्वाद लेते हैं। इस दौरान विशेष पूजा, भंडारे और जागर अनुष्ठान होते हैं, जिसमें देवता से जुड़ी कथाओं का गान किया जाता है। मान्यता है कि इस अवसर पर की गई पूजा-अर्चना से घर-परिवार की समृद्धि, स्वास्थ्य और सुरक्षा बनी रहती है। आसपास के हिमाचल प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे यह पर्व अंतर्राज्यीय धार्मिक एकता का प्रतीक बन जाता है।

    सांस्कृतिक धरोहर

    जागड़ा पर्व धार्मिक आयोजन के साथ-साथ एक सांस्कृतिक महाकुंभ भी है। यहां परंपरागत लोकनृत्य, गीत और संगीत प्रस्तुत किए जाते हैं। ढोल-दमाऊं, रणसिंघा और हुड़का जैसे वाद्ययंत्रों की थाप पर पूरा वातावरण गूंज उठता है। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक पोशाकों में सामूहिक नृत्य करते हैं, जो जौनसारी संस्कृति की झलक पेश करता है। मेलों के रूप में यहां हस्तशिल्प, पारंपरिक आभूषण, लोकभोजन और ग्रामीण जीवन से जुड़े उत्पाद भी देखने को मिलते हैं।

    सामाजिक और सामूहिक महत्व

    जागड़ा पर्व केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिकता और लोकजीवन का उत्सव भी है। यह पर्व गांव-गांव के लोगों को एक मंच पर लाता है। अलग अलग गाँव के लोग हर साल इस पर्व का इंतज़ार करते है। इसमें सामाजिक समरसता, भाईचारा और सहयोग की भावना प्रकट होती है। यह अवसर युवाओं को अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।

    सरकार और प्रशासन की तैयारी

    हर वर्ष की तरह इस बार भी उत्तराखंड सरकार और प्रशासन इस पर्व की तैयारियों में जुटा है। आज यानि 26-27 अगस्त को हनोल में आयोजित होने वाले जागड़ा पर्व में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखने को मिलेगी। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने साफ-सफाई, पेयजल आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन और भीड़ प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं की समीक्षा की है। साथ ही हिमाचल सरकार से भी अनुरोध किया गया है कि श्रद्धालुओं को बस सेवाओं की सुविधा मिलती रहे।

    जागड़ा पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि देवभूमि की जीवित संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। यह पर्व बताता है कि किस तरह लोक-परंपराएं, संगीत, नृत्य और आस्था मिलकर समाज को एक धागे में पिरोते हैं। हनोल का यह उत्सव उत्तराखंड और हिमाचल की साझा धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाता है।

    Share. Facebook WhatsApp Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email Telegram
    Avatar photo
    Amit Thapliyal

    Related Posts

    उत्तराखंड में मौसम का कहर: बदरी-केदारनाथ में बर्फबारी, देहरादून में बारिश का अलर्ट

    April 8, 2026

    उत्तराखंड में खनन राजस्व ने बनाया इतिहास, धामी सरकार में 1200 करोड़ से ज्यादा आय

    April 7, 2026

    14 अप्रैल को उत्तराखंड आएंगे पीएम मोदी, करोड़ों की योजनाओं का करेंगे उद्घाटन

    April 6, 2026

    उत्तराखंड: शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी पर हाईकोर्ट सख्त: अपात्रों की सिफारिश पर उठे गंभीर सवाल

    April 5, 2026
    Add A Comment

    Leave A Reply Cancel Reply

    © 2026 Dainik Ujala.
    • Home
    • Contact Us

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Go to mobile version