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    Home»ब्लॉग»भाजपा की निर्णायक लड़ाई का निष्कर्ष
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    भाजपा की निर्णायक लड़ाई का निष्कर्ष

    Amit ThapliyalBy Amit ThapliyalDecember 14, 2024No Comments6 Mins Read
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    अजीत द्विवेदी
    संसद के शीतकालीन सत्र में हर दिन राजनीति का नया रंग देखने को मिल रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने किसी हाल में अडानी का मुद्दा नहीं छोडऩे का फैसला किया है तो दूसरी ओर सत्तारुढ़ दल यानी भाजपा भी निर्णायक लड़ाई की तैयारी में है। भाजपा की निर्णायक लड़ाई का निष्कर्ष यह है कि लोकसभा में यानी जनता के सदन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ‘गद्दार’ हैं, सबसे बड़े विपक्षी पार्टी कांग्रेस की संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी भी देश विरोधी हैं और अमेरिका दुश्मन देश है। भाजपा ने संसद की बहस और चर्चाओं के साथ साथ प्रेस कांफ्रेंस करके भी यह नैरेटिव स्थापित किया है। जब भाजपा के सांसदों ने आरोप लगाए तब भी ये आरोप गंभीर थे लेकिन अब तो केंद्र सरकार के मंत्रियों ने भी इन आरोपों को दोहराया है। तभी यह सवाल गंभीर हो गया है कि क्या सचमुच नेता प्रतिपक्ष ‘गद्दार’ या देश विरोधी हैं और क्या सचमुच अमेरिका भारत का दुश्मन है?

    पहले अमेरिका पर लगाए गए आरोपों की चर्चा करें तो उसमें कई बातों का खुलासा हो गया है। भाजपा के सांसदों ने जब कहा कि ओसीसीआरपी यानी ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल है और इस संस्था को अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस और अमेरिकी विदेश विभाग की फंडिंग मिलती है तब अमेरिका ने इस पर अपना पक्ष रखा था। अमेरिका ने कहा था कि वह मीडिया की स्वतंत्रता का चैंपियन रहा है और इस तरह के किसी भी संगठन पर दबाव नहीं बनाता है। इतना ही नहीं अमेरिका ने इसे निराशाजनक बताया था कि भारत में सत्तारूढ़ दल इस किस्म के आरोप लगा रहा है। अब सवाल है कि भाजपा ने ये आरोप किस आधार पर लगाए थे? भाजपा का आरोप फ्रांस के मीडिया समूह ‘मीडियापार्ट’ की एक रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कथित तौर पर यह कहा गया था कि ओसीसीआरपी को अमेरिकी विदेश विभाग की फंडिंग है। अब ‘मीडियापार्ट’ ने जवाब दिया है और कहा है कि भारत में सत्तारूढ़ दल यानी भाजपा ‘फेक न्यूज’ फैला रही है। उसका कहना है कि उसकी रिपोर्ट को गलत तरीके से उद्धृत किया जा रहा है, अपने मनमाफिक राजनीतिक नैरेटिव सेट करने के लिए।

    अमेरिका और फ्रांस के मीडिया समूह दोनों के जवाब के बाद भी भाजपा ने आरोप लगाना बंद नहीं किया है। भाजपा के सांसद अब भी दावा कर रहे हैं कि अमेरिका की फंडिंग से चल रहा एक संगठन भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। अब सवाल है कि उस संस्था यानी ओसीसीआरपी की भारत विरोधी गतिविधियां क्या हैं? ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट ने पेगासस के इस्तेमाल की जानकारी दी थी और एक रिपोर्ट में अडानी समूह पर शेयर बाजार में जोड़तोड़ का आरोप लगाया था। यही बात हिंडनबर्ग रिसर्च ने भी कही थी। सोचें, इसमें से कौन सी बात भारत विरोधी हो गई? अगर स्वतंत्र पत्रकारों के किसी समूह ने जासूसी के लिए पेगासस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की रिपोर्ट दी या किसी कंपनी विशेष पर जोड़तोड़ का आरोप लगाया तो इसे देश विरोधी कैसे माना जा सकता है? लेकिन भाजपा का कहना है कि यह संस्था भारत के आर्थिक विकास को रोकना चाहती है। घूमा फिरा कर यह बात भी कही जा रही है कि राहुल गांधी के इशारे पर यह काम हो रहा है।

    इसका मतलब है कि राहुल गांधी इतने पावरफुल हैं कि वे अमेरिका जाते हैं और जॉर्ज सोरोस व अमेरिकी विदेश विभाग को इसके लिए तैयार करते हैं कि वे भारत विरोधी गतिविधियां चलाएं? भारत में आर्थिक विकास को बाधित करें? अगर ऐसा है तो फिर पूरी दुनिया में प्रधानमंत्री का डंका किस बात का बज रहा है? फिर तो डंका राहुल गांधी का बज रहा है जो वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश से मनचाहा काम करवा रहे हैं! फिर जो बाइडेन और डोनाल्ड ट्रंप किस बात के प्रधानमंत्री के दोस्त हैं, जो उनके देश से राहुल गांधी के कहने पर भारत विरोधी गतिविधियां चल रही हैं? एक बड़ा सवाल यह भी है कि अमेरिका को दुश्मन बता कर भारत को क्या हासिल होगा? पिछले कई दशकों से अमेरिका के साथ भारत के संबंध स्थिर और दोस्ताना रहे हैं। अगर इतना दोस्ताना नहीं भी होता तो किसी स्वतंत्र संस्था की रिपोर्ट के आधार पर किसी देश को दुश्मन या विरोधी बताना कोई अच्छी कूटनीति नहीं होती है। तभी यह सवाल भी है कि अमेरिका पर हमला सिर्फ ओसीसीआरपी में उसकी कथित फंडिंग की वजह से है या कहीं इसके पीछे अमेरिकी अदालत द्वारा गौतम अडानी व सागर अडानी सहित आठ लोगों को आरोपी बनाने, अमेरिकी अखबारों में भारत के बड़े नेताओं के नाम आने और अमेरिकी एजेंसियों द्वारा भारतीय नागरिकों को मोस्ट वांटेड और भगोड़ा बताने का भी हाथ है? जो हो यह एक गंभीर मामला है और सत्तारूढ़ दल को सोच समझ कर इस मामले में आरोप लगाने चाहिए।

    दूसरी बात लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी को देश विरोधी बताने का है। राहुल को ‘गद्दार’ बताने का आधार यह है कि वे अमेरिका जाते हैं तो इल्हान उमर और कुछ अन्य भारत विरोधी लोगों से मिलते हैं और सोनिया गांधी इसलिए देश विरोधी हैं क्योंकि वे फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन एशिया पैसिफिक की सह अध्यक्ष हैं। यह संस्था कश्मीर को कथित तौर पर भारत से अलग करने की बात करती है। सोचें, नेता प्रतिपक्ष का पद एक संवैधानिक पद होता है और उस पद पर बैठे एक निर्वाचित नेता को भाजपा के सांसद संबित पात्रा ने कुछ लोगों से उनकी मुलाकातों के आधार पर ‘शीर्ष स्तर का ‘गद्दार’ कहा। इससे पहले राहुल गांधी पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार, अक्षमता आदि के आरोप लगते थे। उनको बालक बुद्धि तो अब भी कहा जाता है। संसदीय कार्य मंत्री ने सोमवार, नौ दिसंबर को ही उनको बालक बुद्धि कहा। लेकिन वही बालक बुद्धि देश के खिलाफ साजिश रच रहा है और ‘गद्दार’ है, यह पहली बार कहा जा रहा है। जाहिर है कि इस बार राहुल गांधी ने कुछ ज्यादा बड़ी तकलीफ दे दी है।

    ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अनाप शनाप बातें नहीं कहते हैं। वे भी प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा गिराने वाली बातें कहते हैं। लेकिन वे वही बातें कहते हैं, जो आजादी के बाद से अब तक कही जाती रही हैं। जो दूसरे प्रधानमंत्रियों के लिए कही गईं वैसी ही बातें वे भी कहते हैं। परंतु यह पहली बार है, जब सत्तारूढ़ दल ने नेता प्रतिपक्ष पर इतना बड़ा हमला किया है और नेता प्रतिपक्ष को ‘गद्दार’ ठहराया। निश्चित रूप से ऐसा कहने के लिए उसके पास कुछ बड़ा और पुख्ता सबूत होना चाहिए। राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए या संसद में उनका मुंह बंद कर देने के लिए इस तरह के आरोप नहीं लगाए जा सकते हैं। इस तरह के आरोप लगाए गए हैं तो केंद्र सरकार की एजेंसियों को उनकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। कायदे से जांच पहले होनी चाहिए थी और उसके बाद आरोप लगाए जाने  चाहिए थे। लेकिन अगर आरोप पहले लगा दिए गए हैं और केंद्र सरकार के मंत्री दावा कर रहे हैं कि आरोप का कंटेंट गंभीर है तो उसकी गहराई से जांच होनी चाहिए। सिर्फ जुबानी जंग नहीं होनी चाहिए और न इतने गंभीर आरोप का सिर्फ राजनीतिक इस्तेमाल होना चाहिए।

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